मौसम की एजेंसियों ने 2026 में अल-नीनो के आने की पुष्टि की है, जिससे भारत में मॉनसून सामान्य से 10% कम रहने की आशंका है. इसलिए जुलाई-अगस्त में मध्य और उत्तर-पश्चिम भारत में सूखा रह सकता है.
प्रशांत महासागर में मौसम का महादानव अल-नीनो शुरू हो गया है. लेकिन अगस्त-सितंबर में पॉजिटिव इंडियन ओशन डाइपोल बनने की संभावना है, जो अल-नीनो को कमजोर कर, भारत में अच्छे मॉनसून की उम्मीद जगाता है.
गॉडजिला एल नीनो के कारण जुलाई से सितंबर के बीच गुजरात, गोवा और महाराष्ट्र सहित भारत के पश्चिमी हिस्सों में सूखे का भारी खतरा है. देश में गंभीर जल संकट और कृषि को नुकसान हो सकता है.
पाकिस्तान में बने साइक्लोनिक सर्कुलेशन के कारण दिल्ली-NCR में अचानक धूल भरा तूफान, बिजली चमकने और बारिश का सिलसिला शुरू हो गया है. मौसम विभाग ने 'रेड अलर्ट' जारी कर सावधानी बरतने की सलाह दी है.
चीनी वैज्ञानिकों ने हिंद महासागर में 53 लाख साल पुराना दुनिया का सबसे बड़ा 'व्हेल कब्रिस्तान' खोजा है. ये कंकाल गहरे समुद्र के दुर्लभ जीवों के लिए भोजन और विकास का इकोसिस्टम तैयार कर रहे हैं.
वैज्ञानिकों ने पहली बार इंसानी आंख में 'ER-100' दवा इंजेक्ट कर बुढ़ापा हटाने का ऐतिहासिक ट्रायल शुरू किया है. इससे इंसानी उम्र के बढ़ने के असर को रोका जा सकेगा. बुढ़ापे को पलटा जा सकेगा.
जलवायु परिवर्तन के कारण भारत में हीटवेव की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं. पिछले 13 वर्षों में हीटवेव वाले दिन दोगुने हो गए हैं. 2013 में 100 दिन थे, जो अब 200 दिनों तक पहुंच गए हैं.
IMD उत्तर-पश्चिम भारत में 13 जून तक बारिश का अलर्ट जारी किया है. 11 और 12 जून को गरज-चमक के साथ तेज हवाएं (50-60 kmph) और ओला गिरने की संभावना है.
फिलीपींस में 7.8 तीव्रता के भूकंप ने भारी तबाही मचाई. 41 लोगों की मौत हो गई. 500 से ज्यादा घायल हुए. 2500 मकान क्षतिग्रस्त हो गए. भूकंप के बाद मलबे में फंसे लोगों की तलाश जारी है.
पाकिस्तान ने पिछले 16 महीनों में छह नए सैटेलाइट लॉन्च कर अपनी अंतरिक्ष आधारित निगरानी और खुफिया क्षमताओं को बढ़ाया है. इन सैटेलाइट्स में ऑप्टिकल इमेजिंग, हाइपरस्पेक्ट्रल और रिमोट सेंसिंग तकनीक का इस्तेमाल किया गया है, जिससे पाकिस्तान भारत की भूमि पर नजर रख सकता है.
दक्षिणी फिलीपींस में आए 7.8 तीव्रता के भीषण भूकंप में 41 लोगों की मौत हो गई और 450 से अधिक घायल हैं. मलबे के कारण कई इलाके कट गए हैं. सुनामी लहरों का वीडियो वायरल हो रहा है.
मध्य भारत में सूखी-गर्म हवाओं के ब्लॉकेज से मॉनसून की रफ्तार धीमी पड़ गई है. 20 जून तक मॉनसून के सुस्त रहने की आशंका है, जिससे खरीफ फसलों की बुवाई और मिट्टी की नमी प्रभावित हो सकती है.
प्रशांत महासागर में रिकॉर्ड-तोड़ गर्मी के कारण सदी के सबसे खतरनाक 'सुपर अल-नीनो' की चेतावनी जारी की गई है. ये एक्टिव हुआ तो भारत में गंभीर सूखा, भीषण गर्मी और फसलों की बर्बादी हो सकती है.
सूर्य पर बढ़ी गतिविधियों ने एक बार फिर वैज्ञानिकों का ध्यान आकर्षित किया है. हालिया सौर घटनाओं के बाद अंतरिक्ष मौसम विशेषज्ञ लगातार स्थिति की निगरानी कर रहे हैं. ऐसे घटनाक्रम पृथ्वी के चुंबकीय वातावरण को प्रभावित कर सकते हैं और कुछ क्षेत्रों में ऑरोरा जैसे प्राकृतिक प्रकाशीय दृश्य देखने की संभावना भी बढ़ा सकते हैं. वैज्ञानिक एजेंसियां आंकड़ों का विश्लेषण कर संभावित प्रभावों का आकलन कर रही हैं.
सूर्य की सतह पर हुए विस्फोट से एक तेज मैग्नेटिक तूफान पृथ्वी की ओर बढ़ रहा है. इसके असर से भारत के उत्तरी क्षेत्रों में नॉर्दन लाइट्स (ऑरोरा) दिखने की संभावना है.
IMD के अनुसार, केरल और महाराष्ट्र होते हुए मॉनसून तेजी से आगे बढ़ रहा है. दिल्ली-NCR में 25 से 30 जून के बीच पहुंचने की उम्मीद है. प्री-मॉनसून वाली बारिश और उमस से दिल्ली धधक रही है.
जमीन के अंदर से ज्यादा पानी निकालने की वजह से पृथ्वी पर वजन का संतुलन बिगड़ गया है. इसके चलते पृथ्वी की धुरी करीब 31.5 इंच खिसक गई है, जिससे समुद्र का जलस्तर भी बढ़ा है.
भारत का मॉनसून अब पहले से ज़्यादा अनिश्चित होता जा रहा है. कहीं बाढ़ तो कहीं सूखे जैसी स्थिति देखने को मिल रही है. जानिए मॉनसून को प्रभावित करने वाले कारक और क्लाइमेट चेंज का असर. एक्सपर्ट्स का कहना है कि बेहतर मौसम पूर्वानुमान, जल संरक्षण, फसल बीमा और जलवायु-अनुकूल कृषि पद्धतियां भविष्य की चुनौतियों से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं.
8 करोड़ साल पुरानी मॉनसून व्यवस्था आज भी वैज्ञानिकों के लिए रहस्य बनी हुई है. अनिश्चित बारिश, सूखा और बाढ़ किसानों को परेशान कर रही है. क्लाइमेट चेंज से मॉनसून और बेईमान हो गया है.
पेंटागन के लीक दस्तावेजों से खुलासा हुआ है कि कोल्ड वॉर के दौरान अमेरिकी सेना ने मच्छरों और टिक्स को जैविक हथियार के रूप में विकसित करने के लिए नागरिकों और सैनिकों पर गुप्त परीक्षण किए थे.
पिछले एक दशक में विकास के नाम पर हिमालयी क्षेत्रों में अंधाधुंध निर्माण, वनों की कटाई और ढीले नीतिगत फैसलों ने पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाया है. भूस्खलन, बाढ़ और जल संकट इसके प्रमाण हैं.